मिच्छामि दुक्कड़म : क्षमा का स्पर्श कहीं स्क्रीन तक न सिमट जाए* - *मुनिश्री चारित्ररत्न विजयजी* *आमने-सामने की क्षमायाचना से डिजिटल औपचारिकता तक पहुंचती परंपरा के बीच आत्मचिंतन का प्रश्न

योगेंद्र नाहर
*मिच्छामि दुक्कड़म : क्षमा का स्पर्श कहीं स्क्रीन तक न सिमट जाए* - *मुनिश्री चारित्ररत्न विजयजी*

*आमने-सामने की क्षमायाचना से डिजिटल औपचारिकता तक पहुंचती परंपरा के बीच आत्मचिंतन का प्रश्न*

                          खबर संकलन 
    झाबुआ पॉइंट के प्रधान सम्पादक योगेन्द्र नाहर 

इंदौर/झाबुआ /भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में कुछ शब्द केवल उच्चारण नहीं, बल्कि अंतरात्मा की स्थिति को दर्शाने वाले अनुभव होते हैं। *जैन धर्म के महापर्व पर्युषण का अंतिम पवित्र उद्गार ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ भी ऐसा ही जीवंत अनुभव है। पहले जहां क्षमायाचना आमने-सामने मिलकर, हाथ जोड़कर और गले लगकर की जाती थी, वहीं आधुनिक समय में यह परंपरा धीरे-धीरे मोबाइल संदेशों और सोशल मीडिया तक सीमित होती जा रही है। यह बदलाव इस महान आध्यात्मिक अनुष्ठान की मूल आत्मा के लिए चिंतन का विषय है। उक्त प्रेरक बात इंदौर नगर में गुरु राज स्पर्श चातुर्मास हेतु बिराजमान  श्रीमद् विजय जयन्तसेनसूरि महाराज के शिष्य मुनिराज श्री चारित्ररत्न विजयजी महाराज ने कही उन्होंने कहा कि खमत-खामणा और ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि अहंकार के विसर्जन और आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है।*
*प्रत्यक्ष संवाद और हृदय का स्पर्श* उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति से मनमुटाव हो, जिसके साथ लंबे समय से संवाद बंद हो या जिसके प्रति मन में ईर्ष्या हो, उसके सामने जाकर क्षमा मांगना आसान नहीं होता। उस समय अहंकार व्यक्ति को झुकने से रोकता है, लेकिन पर्युषण की पावन बेला में यही अहंकार पिघलता है। आमने-सामने की क्षमायाचना में आंखों का मिलना, भावनाओं का जागना और हृदय का स्पर्श—ये सभी मिलकर रिश्तों को शुद्ध करने का माध्यम बनते हैं।
*फॉरवर्डेड संदेशों से कमजोर पड़ता क्षमा का भाव* डिजिटल संदेशों तक सीमित होती क्षमायाचना पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिराज ने कहा कि आज तकनीक ने दूर बैठे लोगों तक संदेश पहुंचाना आसान कर दिया है। पर्युषण के दौरान रंग-बिरंगे ग्राफिक्स और तैयार संदेशों के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ भेज दिया जाता है। यह सुविधा उपयोगी हो सकती है, लेकिन जब प्रत्यक्ष संवाद का स्थान केवल औपचारिक फॉरवर्ड ले लेता है, तब क्षमायाचना का भाव कमजोर पड़ने लगता है।
*सच्ची नम्रता और आत्मशुद्धि का अर्थ*

 उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति से सालभर संवाद नहीं हुआ, उससे वास्तविक संबंध सुधारने का प्रयास किए बिना केवल एक संदेश भेज देना आत्मचिंतन का विकल्प नहीं हो सकता। क्षमा मांगने का अर्थ केवल संदेश भेजना नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकना, अपनी भूल स्वीकार करना और सामने वाले के प्रति सच्ची नम्रता प्रकट करना है।



*डिजिटल सुविधा और भाव की दूरी*

 तकनीकी जुड़ाव के बावजूद मानवीय दूरियां बढ़ने की विडंबना के बारे में  मुनिराज श्री चारित्ररत्न विजयजी ने कहा कि आधुनिक जीवन की विडंबना यह है कि तकनीकी रूप से मनुष्य पहले से अधिक जुड़ा हुआ है, लेकिन मानवीय स्तर पर दूरियां भी बढ़ रही हैं। कई बार लोग दूर बैठे परिचितों को संदेश भेज देते हैं, जबकि परिवार, पड़ोस या कार्यस्थल में साथ रहने वाले व्यक्ति से संवाद बंद रहता है।

*आंतरिक पश्चात्ताप और कर्मनिर्जरा* 

उन्होंने कहा कि जब क्षमायाचना केवल एक औपचारिक फॉरवर्ड बनकर रह जाती है, तब उसके पीछे का पश्चात्ताप और आत्मशुद्धि का भाव कमजोर हो जाता है। जैन दर्शन में कर्मनिर्जरा के लिए भीतर का मैल सच्चे पश्चात्ताप और आत्मपरिवर्तन से दूर होना आवश्यक है। केवल बाहरी औपचारिकता से मन की ईर्ष्या, प्रतिशोध और अहंकार की दीवारें नहीं टूटतीं।
*प्रत्यक्ष क्षमायाचना की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान*  प्रत्यक्ष क्षमायाचना की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान करते हुए  मुनिराज ने कहा कि आधुनिकता और तकनीक अपने आप में बुरी नहीं हैं। तकनीक ने दूरियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन जब वही तकनीक दिलों के बीच की दूरी को पाटने के बजाय उसे छिपाने का माध्यम बन जाए, तब आत्मचिंतन आवश्यक हो जाता है।
*जीवंत आध्यात्मिक धड़कन बनाए रखने का संदेश* 
उन्होंने आह्वान किया कि यदि परिवार, पड़ोस या कार्यस्थल में किसी व्यक्ति से मनमुटाव है, तो उसे केवल स्क्रीन के संदेश से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष मिलकर क्षमा मांगनी चाहिए। आंखों में आंखें डालकर, नम्रता के साथ अपनी भूल स्वीकार करना ही ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ की वास्तविक भावना है। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष क्षमायाचना से मिलने वाला आत्मिक हल्कापन और आंतरिक शांति किसी आधुनिक गैजेट या फॉरवर्डेड संदेश से प्राप्त नहीं हो सकती। आवश्यकता है कि ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ को केवल सोशल मीडिया की औपचारिकता न बनने दें, बल्कि इसे अपने जीवन की जीवंत आध्यात्मिक धड़कन बनाए रखें।

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